Q.  शोकगीत की दृष्टि से ‘सरोज स्मृति’ का मूल्यांकन करें।

सूर्यकांत त्रिपाठी निराला का जन्म 21 फरवरी 1897 ई० में हुआ। ‘महाप्राण’ नाम से विख्यात निराला छायावादी दौर के चार स्तंभों में से एक हैं। उनकी कीर्ति का आधार ‘सरोज स्मृति’, ‘राम की शक्ति पूजा’, ‘कुकुरमुत्ता’ हैं; बतौर अनुवादक भी वे सक्रिय थे। वह हिंदी में मुक्तक छंद के प्रवर्तक भी माने जाते हैं। उनकी कविता में विषय की विविधता और नवीन प्रयोगों की बहुलता है। शृंगार, रहस्यवाद, राष्ट्रप्रेम, प्रकृति-वर्णन के अतिरिक्त शोषण और वर्गभेद के विरुद्ध विद्रोह, शोषित एवं दीन-हीन जन के प्रति सहानुभूति तथा पाखंड और प्रदर्शन के प्रति व्यंग्य उनके काव्य की विशेषताएँ हैं।

– निराला अपनी प्रयोगधर्मिता के लिए विख्यात हैं। ये ओज और करुण के कवि माने जाते हैं। रामविलास शर्मा ने निराला को “ओज और औदात्य का कवि” कहा है तथा “राग-विराग” नाम से निराला की कविताओं का सम्पादन किया है।

– निराला छायावाद के शलाका पुरुष माने जाते हैं। ये अपने जीवन में सबसे पहले ‘समन्वय’-1922 पत्रिका से जुड़े। इसके बाद द्वितीय स्थान पर ‘मतवाला’-1923 पत्रिका से जुड़े।

 निराला की पहली रचना – जूही की कली (1916)

 अंतिम कविता – पत्रोत्कंठित (1961)

– निराला का अंतिम काव्य संग्रह सांध्यकाकली (1969) है। इनका एकमात्र काव्य संग्रह जो मरणोपरांत प्रकाशित हुआ।

सूर्यकांत त्रिपाठी निराला काव्य संग्रह

1. अनामिका प्राचीन भाग-1

2. अनामिका द्वितीय भाग

3. परिमल

4. गीतिका

5. तुलसीदास

6. कुकुरमुत्ता

7. अणिमा

8. बेला

9. नए पत्ते

10. अर्चना

11. आराधना

12. गीत कुंज

13. अपरा

14. सांध्य काकली

– निराला की सरोज स्मृति (1935) शोक गीत कविता है। जिसे निराला जी ने अपनी पुत्री सरोज की स्मृति पर लिखा है। इस कविता के माध्यम से वह अपनी प्रिय पुत्री के जीवन की घटनाओं को स्मरण कर उसे कविता के माध्यम से जीवंत करते हैं। एक पिता द्वारा अपनी प्रिय पुत्री के मृत्यु पर लिखा यह प्रथम शोकगीत है।

इस संदर्भ में रामविलास शर्मा जी कहते हैं कि – “शोक गीत हिन्दी में तो कम लिखे गए। यूरोप की भाषाओं में ऐसा शायद ही कोई प्रभावशाली गीत हो जिसे कवि पिता ने अपनी पुत्री के निधन पर लिखा हो।”

– “यूरोप के शोक गीतों में दुख और क्षोभ की ऐसी विकट परिणति कहीं नहीं है। किंतु शेक्सपियर के किंग लियर में… निराला का हृदय – विशुद्ध स्वर लियर की करुण व्याकुल पुकार से मिलती – जुलती है।”

– निराला की सरोज स्मृति गहरे भावों से भरी है। इसमें भावों के विविध रूप के दर्शन होते हैं। जैसे – दुख-सुख, हताशा-निराशा की भावना, हास्य-व्यंग्य के भाव आदि कहानी की तरह आते रहते हैं। इस संदर्भ में डॉ. शशि कला पांडे कहती हैं कि –

“निराला की कविता सरोज स्मृति भी गहरे भावबोध की कविता है। इस पूरी कविता में निराला के जीवन की विविध भाव दुख-सुख, हताशा और निराशा के दर्शन होते हैं।”

• सरोज के देहावसान का वर्णन

निराला जी सरोज स्मृति के प्रारंभ में ही सरोज के 19 वर्ष की आयु में देहावसान का वर्णन करते हैं। यह दुख के परे जीवन सत्य का दर्शन उपस्थित करता है। इसमें करुणा का उत्ताप नहीं है बल्कि शांत और गंभीर चिंतन का स्वर है। निराला सरोज की मृत्यु बीमारी और समुचित चिकित्सा के कारण होना न मानकर यह मानते हैं कि उसके जीवन के 18 अध्याय पूरे हो चुके थे। सरोज के मरण जीवन में शाश्वत विराम की ओर जाने की यात्रा है क्योंकि उसने अपने जीवन के 18 वर्ष जो गीता के 18 अध्याय के समान हैं, जिसे उसने पूर्ण कर लिया, उसके बाद तो नामरूप का त्याग कर अमर शाश्वत विराम प्राप्त करना ही शेष रहता है। इसे वे मरना न मानकर सरोज का ज्योतिर्गमन मानते हैं। कवि ने अपने दार्शनिक विचारों के द्वारा आरम्भ में ही कविता में महाकाव्योचित औदात्य की गरिमा को अभिव्यक्ति प्रदान की है –

• अनविंश पर जो प्रथम चरण ,तेरा वह जीवन सिन्धु-तरण

• जीवन के अष्टादशाध्यायः, यह मृत्यु-तरणि पर पूर्ण-वरण

• पुत्री के पालन-पोषण में कमी:

निराला पुत्री का धनाभाव के कारण समुचित पालन-पोषण भी नहीं कर पाए। वह अपने अभागे जीवन को दुत्कारता है अपनी निर्धनता को कोसता है कि उसका पिता होना ही व्यर्थ है व उसके लिए कुछ भी नहीं कर सका। धनोपार्जन में निराला जी असमर्थ रहे, जिसके परिणामस्वरूप सरोज का पालन-पोषण भी उचित ढंग से नहीं कर सका।

वे अपनी बेटी को सम्बोधित करते हुए कहते हैं कि मैं व्यर्थ ही तुम्हारा पिता बना। यद्यपि धन उपार्जित करने के सभी उपाय मालूम थे, पर मैं उन उपायों को औजार के रूप में इस्तेमाल नहीं कर सका क्योंकि ऐसे धन कमाने के रास्ते में अनेक बुराइयाँ थीं।

• धन्ये, मैं पिता निरर्थक था, कुछ भी तेरे हित न कर सका!

• अस्तु मैं उपार्जन को सक्षम, कर नहीं सका। पोषण उत्तम

• कमजोर आर्थिक स्थिति व दुरावस्था

निराला जी भले ही आज हिन्दी के महत्वपूर्ण कवि माने जाते हैं पर उस काल में हिन्दी जगत में उन्हें उचित पारिश्रमिक प्राप्त नहीं होता था। अतः उनकी आर्थिक स्थिति बड़ी कमजोर थी, जिसका फल यह भी सामने आया कि वे अपनी पुत्री का समुचित पालन-पोषण भी नहीं कर सके थे।

देखता रहा मैं खड़ा अपल

वह शर-क्षेप वरण-कौशल

. निराला के व्यक्तिगत दुःखों की कविता

निराला का सम्पूर्ण जीवन कष्टों व तकलीफों से भरा हुआ था। बचपन में माँ, बाद में पत्नी और अन्य परिवारजनों की मृत्यु और अन्त में अपनी पुत्री सरोज की मृत्यु ने निराला के जीवन को दुख से भर दिया था। कवि निराला आम आदमी की तरह अपने दुःख व वेदना की अभिव्यक्ति को उदात्त रूप से शोकगीत लिखकर अपनी पुत्री सरोज का तर्पण करते हैं।

‘दुःख ही जीवन की कथा रही

क्या कहूँ आज जो नहीं कही!’

अपने साहित्यिक योगदान पर गर्व

निराला जी कहते हैं कि “मेरा वह योगदान किसी ने नहीं समझा, जो मैंने साहित्य के अगाध सागर में, मैंने और उन्होंने भी महत्वपूर्ण योगदान दिया है। क्योंकि मेरी साहित्यिक कृतियों को यदि अन्य साहित्यिक कृतियों के समक्ष रखकर परखा जाए तो स्पष्ट हो जाएगा कि वे भी उतनी ही महत्वपूर्ण हैं जितनी अन्य महानुभावों की महत्वपूर्ण कृतियाँ।”

वे यह भी कहते हैं कि उन्होंने गद्य और पद्य दोनों ही क्षेत्रों में महत्वपूर्ण कार्य किया है और बड़े सहज अधिकार के साथ श्रेष्ठ साहित्य की रचना की है।

• सोचा है नत हो बार-बार, यह हिन्दी का स्नेहोपकार

• पार्श्व में अन्य रख कुशल हस्त, गद्य में पद्य में सम्भ्यस्त

सरोज की बाल्यावस्था का चित्रण

निराला ने पुत्री की बाल्यावस्था का बड़ा प्रभावी चित्रण किया है, जिसमें उसकी बाल-क्रीड़ाओं की भी व्यंजना है। लेखक सवा साल की बालिका के रूप में सरोज का ज़िक्र करते हैं, उस समय सरोज को अपनी माँ के चुम्बनों का सुख प्राप्त होता था, माँ के चले जाने के बाद नानी की गोद में बाल क्रीड़ाएँ सम्पन्न होती रही। सरोज अपने भाई के साथ भी खेलती-कूदती थी वे गंगातट की बालू पर घूमने चले जाते थे।

तू सवा साल की जब कोमल, पहचान रही ज्ञान में चपल

साहित्य क्षेत्र के संघर्ष की अभिव्यक्ति

निराला जी बताते हैं कि वे निरंतर काव्य-सृजन में संलग्न थे पर सम्पादकगण उदासीन भाव से उन्हें लौटा दिया करते थे। वे मात्र पत्र रचना पर एक या दो पंक्ति की टिप्पणी लिख दिया करते थे। जब रचना लौट आती थी, तब वे लौटी रचना को हाथ में लेकर बड़े उदास भाव से आकाश को ताकता रहता था।

तब भी मैं इसी तरह समस्त

कवि जीवन में व्यर्थ व्यस्त

लिखता अबाध गति मुक्तक छन्द

निराला के पुनर्विवाह की चर्चा

मनोहरा देवी की मृत्यु के बाद सरोज नानी के संरक्षण में पल रही थी। उस समय निराला के दूसरे विवाह की चर्चाएँ चल पड़ी थीं। वे टालते रहे पर एक सज्जन एक सुन्दर शिक्षित कन्या का प्रस्ताव लेकर आये और कई तर्कों से वे निराला जी को प्रभावित करने का प्रयास करने लगे। सहसा निराला के मन में भी लालसा जगी पर उसी समय सरोज खिलखिलाती हुई उनके सामने आ गयी और सारा भाव बदल गया। पर आखिर में उन्होंने उस प्रस्ताव से भी इनकार कर दिया।

इससे पहले आत्मीय स्वजन; सस्नेह कह चुके थे, जीवन सुखमय होगा, विवाह कर लो, जो पढ़ी-लिखी हो-सुन्दर हो

सरोज के यौवनागमन की सरस व्यंजना

निराला जी बताते हैं कि धीरे-धीरे सरोज आगे बढ़ती हुई बाल्यावस्था की क्रीड़ाओं को पार करती हुई यौवन के रमणीक कुंज में प्रवेश कर गयी। वे सरोज के सौन्दर्य की विलक्षणता को बताते हैं कि प्रकृति के सारे उपकरण उसके रूप सौन्दर्य के गीत गाने लगे। निराला सरोज के मधुर कण्ठ के स्वर का गुणगान भी करते हैं जिसमें माँ के समान मधुरिमा भरी थी व पिता के स्वर का ओज भी समाहित था।

धीरे-धीरे फिर बढ़ा चरण, बाल्य की केलियों का प्रगण

कर पार, कुंज-तारुण्य सुंदर आई, लावण्य-भार, थर-थर

. सरोज के विवाह की योजना

सरोज के यौवनागमन पर उसके विवाह की चिन्ता उसकी नानी को हो उठी और उन्होंने निराला जी को यही समझाया कि अब उसके विवाह की योजना बनाई जाए। निराला के सामने सरोज के विवाह की समस्या उपस्थित हो उठी उस समय उनके मन में कान्यकुब्ज ब्राह्मण के प्रति एक विपरीत भाव बसा हुआ था, पर सौभाग्य से उन्हें एक वर दिख गया जो साहित्यकार था,संस्कारवान था।

देना ‘सरोज’ को धन्य धाम, शुचि वर के कर, कुलीन लखकर

सरोज के विवाह का वर्णन

निराला जी बताते हैं कि सरोज के विवाह में उनके साहित्यकार मित्र व अन्य इष्ट मित्र पधारे उन्होंने यह सर्वथा नवीन पद्धति से आयोजित विवाह को देखा। फिर वे सरोज को सम्बोधित करते हुए कहते हैं कि तेरे ऊपर कलश का पवित्र जल छिड़का गया, तेरे मन में पति की सुन्दर छवि आनन्द भर रही थी, तू फूला नहीं समा रही थी। तेरा विवाह हो गया, तेरे विवाह में हमारे रिश्तेदार नहीं पधारे क्योंकि वे आमन्त्रित नहीं थे।

देखा विवाह आमूल नवल, तुझ पर शुभ पड़ा कलश का जल

सामाजिक जीवन के यथार्थ का वर्णन

निराला जी ‘सरोज स्मृति’ में सामाजिक जीवन के यथार्थ का भी चित्र अंकित करते हैं। उस समय का कान्यकुब्ज ब्राह्मण समाज के रीति-रिवाज, विवाह संबंधी लेने-देन, विवाह की प्रणाली, विद्रोही व्यक्ति के प्रति उनका रवैया आदि अनेक बातें इस कविता में प्रत्यक्ष रूप से अभिव्यक्ति पाती हैं। ये कविता सिर्फ कवि की व्यक्तिगत जीवन की सीमा में नहीं बंधती है वरन सामाजिक दशाओं को भी प्रतिबिंबित करती है।

ये कान्यकुब्ज कुल-कुलांगार, खाकर पत्तल में करें छेद,

इनके कर कन्या अर्थ खेद

सामाजिक परंपराओं व रूढ़ियों को चुनौती

निराला का कान्यकुब्ज समाज उस समय दहेज जैसी कई तरह की बुराइयों, रूढ़ियों और सड़ी-गली मान्यताओं से ग्रस्त था। निराला ने अपने पूरे साहस और दृढ़ता के साथ इन बुराइयों का बहिष्कार किया।

जिस तरह कण्व ऋषि ने अपनी पुत्री शकुन्तला का विवाह किया, उसी तरह निराला ने सरोज का विवाह किया।

डॉ. नामवर सिंह ने अपनी पुस्तक ‘छायावाद’ के इस संबंध में लिखा है,

“यह निराला ही हैं, जो तमाम रूढ़ियों को चुनौती देते हुए अपनी सद्यः परिणीता कन्या के रूप का खुलकर वर्णन करते हैं और यह कहना नहीं भूलते कि ‘पुष्प सेज तेरी स्वयं रची’ ।”

→ माँ की कुल शिक्षा मैंने दी, पुष्प सेज तेरी स्वयं रची

सरोज की विदाई से मृत्यु तक का वर्णन

निराला जी कहते हैं कि उन्होंने सरोज को विवाह के समय वह सारी शिक्षा प्रदान की जिसको माता अपनी पुत्री को दिया करती है। उसके लिए फूलों की सेज भी उन्होंने ही सजायी। व सरोज को विदा किया। कुछ समय पति के घर रहकर व अपनी नानी के पास चली गयी अंतिम समय में जिस लता पर वह कली बनकर खिली थी (तेरी माता) वह भी वहीं लहलहायी थी। अंतिम समय में तूने उसी गोद में अन्तिम साँस ली और नेत्र बन्द करके महाप्राण कर गयी। अर्थात अंतिम साँसे सरोज की ननिहाल में निकली।

अन्त भी उसी गोद में शरण

ली, मूूँदे दृग वर महामरण!

निष्कर्ष

कवि सरोज स्मृति में अपनी शोकानुभूति के साथ-साथ समाज की विद्रूपताओं को यथार्थ रूप में सामने लाते हैं। कवि ने नितान्त व्यक्तिगत जीवन-प्रसंगों को उठाकर भी वस्तुपरक तटस्थता द्वारा इसे कलात्मक रचना बना दिया है। इस प्रकार हम कह सकते हैं कि सरोज-स्मृति कविता में एक पिता अपनी पुत्री के प्रति जो भाव है, उसकी अभिव्यक्ति कल्पना का सहारा लेते हुए उसे यथार्थ रूप

में प्रस्तुत किया गया है। हिंदी साहित्य में ऐसी मार्मिक भावनाओं की अभिव्यक्ति जिसमें पिता और पुत्री के समर्पित भाव को दिखाया गया है, वह निराला जी की एकमात्र पहली शोक गीत रचना सरोज-स्मृति है।

निराला इस कविता में दोहरे जीवन को जीते नज़र आते हैं। पहला इनका कवि-कर्म दूसरा इनका निजी जीवन जिसमें कवि के संघर्ष, निराशा और आत्मग्लानि के भाव उजागर होते दिखाई देते हैं। निराला अपनी पुत्री सरोज की मृत्यु के उपरांत न केवल अपने शुभ कर्मों के द्वारा, बल्कि सरोज-स्मृति कविता के माध्यम से भी उसका तर्पण करते हैं।

सरोज स्मृति के संदर्भ में रामस्वरूप चतुर्वेदी जी कहते हैं कि –

“वह कवि की इकलौती बेटी की मृत्यु पर लिखा गया शोक-काव्य है, हिंदी में अपने ढंग का अकेला ही। मझोले आकार की इस कविता में रचनाकार ने विविध मनः स्थितियों को अंकित किया है। नीति, शृंगार और अंत में विराग-भाव में बीच-बीच में करुणा की अंतर्वर्ती धारा बराबर प्रवाहित होती रहती है।”